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मुक्तिबोध की एक आरंभिक कहानी ‘सौन्‍दर्य के उपासक’

मगहिवि के वेबसाईट हिंदी समय को देख रहा था तो अचानक मुक्तिबोध की १९३५ में प्रकाशित इस कहानी पर ध्यान चला गया. कहानी को पढते ही आपसे साझा करने का मन हुआ- जानकी पुल.  ———————————————————————————————————       कोमल तृणों के उरस्‍थल पर मेघों के प्रेमाश्रु बिखरे पड़े थे। रवि …

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‘लोकप्रिय’ शब्द सुनते ही बौद्धिक वर्ग के कान खड़े हो जाते हैं

हिंदी में लोकप्रिय साहित्य के अध्ययन विश्लेषण के कम ही प्रयास हुए हैं. आम तौर पर उनको लुगदी साहित्य, सस्ता साहित्य कहकर टाल दिया जाता है, जबकि हिंदी के बड़े समाज में पढ़ने की रूचि पैदा करने में उनकी गहरी भूमिका रही है. लोकप्रिय साहित्य का एक गंभीर विश्लेषण किया …

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अपनी निंदा छापने के लिए साहस चाहिए

आज जनसत्ता में अपने ‘कभी-कभार’ छपने वाले स्तंभ ‘अनंतर’ में संपादक ओम थानवी ने उस बहस पर अपनी तरफ से पटाक्षेप कर दिया जो मंगलेश डबराल के इण्डिया पॉलिसी फाउन्डेशन के कार्यक्रम में जाने से शुरु हुआ था. हाल के वर्षों में किसी पत्र-पत्रिका में चली यह सबसे जनतांत्रिक बहस …

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