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अपनी निंदा छापने के लिए साहस चाहिए

आज जनसत्ता में अपने ‘कभी-कभार’ छपने वाले स्तंभ ‘अनंतर’ में संपादक ओम थानवी ने उस बहस पर अपनी तरफ से पटाक्षेप कर दिया जो मंगलेश डबराल के इण्डिया पॉलिसी फाउन्डेशन के कार्यक्रम में जाने से शुरु हुआ था. हाल के वर्षों में किसी पत्र-पत्रिका में चली यह सबसे जनतांत्रिक बहस …

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हिंदी के वरिष्ठ लेखक सार्वजनिक बयान देने से क्यों बचते-डरते है?

ज्ञानपीठ-गौरव प्रकरण में खूब बहस चली, आज भी चल रही है. आशुतोष भारद्वाज ने उस प्रकरण के बहाने हिंदी लेखक समाज की मानसिकता, उसके बिखराव को समझने का प्रयास किया है. आशुतोष स्वयं कथाकार हैं, अंग्रेजी के पत्रकार हैं, शब्दों की गरिमा को समझते हैं, लेखन को एक पवित्र नैतिक …

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भगवत ने लोक की आत्मा से हिंदी को समृद्ध किया

भगवत रावत के साहित्यिक अवदान का मूल्यांकन प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे की कलम से- जानकी पुल. ———————————————————————– हिंदी साहित्य जगत बरसों से वाकिफ था कि भगवत रावत गुर्दे की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे.उनका यह लंबा संघर्ष उनकी ऐहिक और सृजनात्मक जिजीविषा का प्रतीक था और कई युवतर,समवयस्क और …

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