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जो कम्यूनिस्ट नहीं है, उसे कम्यूनिस्ट विरोधी होने का हक है

‘कथादेश’ के जून 2013 के अंक में प्रसिद्ध लेखिका-आलोचिका अर्चना वर्मा का लेख प्रकाशित हुआ है ‘असहमति और विवाद की संस्कृति’ शीर्षक से. पिछले दिनों फेसबुक पर कवि कमलेश के सी.आई.ए. के सम्बन्ध में दिए गए एक बयान के सन्दर्भ में एक महाबहस चली, इस लेख में अर्चना वर्मा ने सुविचारित ढंग …

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ये भी कोई जाने की उम्र होती है- दीप्ति नवल

ऋतुपर्णो घोष का जाना सचमुच अवाक कर गया. साहित्य और सिनेमा के खोये हुए रिश्ते को जोड़ने वाले इस महान निर्देशक को आज दीप्ति नवल ने बहुत आत्मीयता से याद किया है. पढ़ा तो साझा करने से खुद को रोक नहीं पाया- जानकी पुल. =================== जाने क्या दिक्कत थी कि उनकी …

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मुझे देखती हैं मोनालिसा की आँखें

कुछ दिन पहले सुमन केशरी की कविताओं के संकलन ‘मोनालिसा की आँखें’ का विमोचन हुआ. सुमन जी शब्दों को इतनी आत्मीयता के साथ स्पर्श करती हैं कि उनके अर्थ नए हो जाते हैं, चीजों को देखने के ढंग बदल जाते हैं. हमारी जानी-पहचानी चीजों को भी उनकी कविता नया बना देती है. …

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